अमृतसर, 24 फरवरी 2025 – गुरु नानक देव विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ पंजाबी स्टडीज में एक विशेष इंटरैक्टिव सेशन का आयोजन किया गया, जिसमें चर्चित प्रवासी पंजाबी लेखिका नीलम लाज सैनी ने अपने जीवन, लेखनी और प्रवासी पंजाबी साहित्य पर अपने विचार साझा किए। कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के संकाय, शोध छात्र और साहित्य प्रेमियों की भारी उपस्थिति रही।
प्रवासी पंजाबी लेखिका नीलम लाज सैनी को विश्वविद्यालय का सम्मान
कार्यक्रम का शुभारंभ डॉ. मंजींदर सिंह, विभागाध्यक्ष, पंजाबी स्टडीज के स्वागत भाषण से हुआ। उन्होंने प्रवासी पंजाबी लेखिका नीलम लाज सैनी को सम्मानस्वरूप एक पौधा भेंट किया और कहा कि अमेरिका आर्थिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का एक वैश्विक केंद्र बन चुका है।
उन्होंने सैनी के साहित्य की सराहना करते हुए कहा कि उनकी रचनाएँ प्रवासी पंजाबी समाज की संघर्ष, संस्कृति और मानसिक द्वंद्व को गहराई से दर्शाती हैं। यह लेखनी उन प्रवासी भारतीयों के संघर्ष और अनुभवों की सजीव झलक प्रस्तुत करती है, जो विदेश में अपने पंजाबी मूल्यों को बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं।
प्रवासी साहित्य और पंजाबी पहचान पर गहन चर्चा
प्रवासी पंजाबी लेखिका नीलम लाज सैनी, जो 1997 से अमेरिका में रह रही हैं, ने अपनी लेखनी की प्रेरणा, प्रवासी जीवन की चुनौतियाँ और पंजाबी भाषा के भविष्य पर विचार साझा किए। उन्होंने कहा कि प्रवासी भारतीयों का अपनी मातृभाषा और संस्कृति से भावनात्मक संबंध बहुत गहरा होता है, लेकिन नई पीढ़ी धीरे-धीरे इससे दूर होती जा रही है।
उन्होंने विशेष रूप से युवाओं से पंजाबी भाषा और लोकसंस्कृति से जुड़े रहने का आग्रह किया। उन्होंने यह भी कहा कि अगर नई पीढ़ी पंजाबी साहित्य और लोककथाओं से दूर हो जाएगी, तो आने वाले समय में यह सांस्कृतिक विरासत खतरे में पड़ सकती है।
लेखन की प्रेरणा और महत्वपूर्ण कृतियाँ
नीलम लाज सैनी ने अपने साहित्यिक सफर और लेखन की प्रेरणा पर बात करते हुए बताया कि उन्होंने अपनी चर्चित कृति “अलविदा कब दी भी नहीं” अपने जीवनसाथी लाज सैनी को समर्पित की।
उनकी अन्य प्रमुख कृतियाँ इस प्रकार हैं:
“हर्फ़ां दी डोर” – प्रवासी जीवन की असलियत पर आधारित एक भावनात्मक कथा।
“अक्स” – प्रवासी पंजाबी पहचान और मानसिक स्थिति को दर्शाने वाली एक गहरी रचना।
“उधारे पलां दी दास्तां” – प्रवासी संघर्षों की मार्मिक कहानी।
“कणी नू लवांदे घुंघरू” – पंजाबी लोकसंस्कृति से जुड़ी एक संवेदनशील कथा।
“लत-लत बल्दा दीवा” – प्रवासी साहित्य में एक महत्वपूर्ण योगदान।
लोकसंस्कृति और प्रवासी लेखन का महत्व
इस इंटरैक्टिव सेशन के दौरान मंच संचालन डॉ. बलजीत कौर रियार ने किया। उन्होंने नीलम लाज सैनी की रचनाओं में पंजाबी लोकसंस्कृति की गहरी जड़ें को रेखांकित किया।
उन्होंने कहा कि प्रवासी पंजाबी साहित्य केवल पुरानी यादों (नॉस्टैल्जिया) तक सीमित नहीं है, बल्कि यह नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने का भी एक प्रभावी माध्यम बन सकता है। प्रवासी लेखक अपने अनुभवों के माध्यम से संस्कृति, भाषा और पहचान की महत्वपूर्ण धरोहर को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का कार्य कर रहे हैं।
प्रवासी साहित्य, डिजिटल युग और पंजाबी भाषा का भविष्य
नीलम लाज सैनी ने बताया कि डिजिटल युग में प्रवासी पंजाबी साहित्य के प्रचार-प्रसार के लिए नए माध्यम उपलब्ध हो रहे हैं। उन्होंने सुझाव दिया कि:
पंजाबी साहित्य को ई-बुक्स और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर बढ़ावा दिया जाए।
युवा लेखकों को पंजाबी ब्लॉग्स और डिजिटल मीडिया के माध्यम से अपनी पहचान बनानी चाहिए।
सोशल मीडिया और पॉडकास्ट जैसे डिजिटल साधनों से पंजाबी साहित्य को नई ऊंचाइयों तक ले जाया जा सकता है।
उन्होंने कहा कि यदि डिजिटल माध्यमों का सही उपयोग किया जाए, तो आने वाले समय में पंजाबी साहित्य और अधिक व्यापक और प्रभावशाली बन सकता है।
पंजाबी साहित्य को बढ़ावा देने का आह्वान
नीलम लाज सैनी ने युवाओं से अपील की कि वे अपनी मातृभाषा में साहित्य पढ़ें, लिखें और बोलें, ताकि पंजाबी भाषा और इसकी समृद्ध विरासत को सहेजा जा सके। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि प्रवासी पंजाबी लेखक भाषा और संस्कृति को जीवंत बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
निष्कर्ष
यह संवाद सत्र पंजाबी साहित्य प्रेमियों के लिए प्रवासी लेखन की गहरी समझ विकसित करने का एक महत्वपूर्ण अवसर था। प्रवासी पंजाबी लेखिका नीलम लाज सैनी ने अपनी लेखनी और अनुभवों के माध्यम से पंजाबी समाज को संस्कृति, भाषा और पहचान से जुड़े रहने का संदेश दिया।
GNDU द्वारा आयोजित यह कार्यक्रम न केवल प्रवासी लेखन के महत्व को दर्शाने वाला रहा, बल्कि नई पीढ़ी के लिए भी प्रेरणादायक साबित हुआ।
